संदेश

प्रदीप्त पूंज

बेजोड़ हो कोई जोड़ नहीं  अद्भुत अनुपम छवि तुम्हारी  व्यक्तित्व तुम्हारा दिव्य है  तुम सबके प्रिय हो वत्स मेरे  आशीष है हम सबका तुम्हे , सूर्य की भांति तेज़ हो  शक्ति तुम्हारी असीम हो   दिव्य हो ,प्रदीप्त हो  संजीव हो ,संजीत हो  मनमीत हो ,नवनीत हो  तुम जिंदगी के गीत हो  शौर्य ,कीर्ति ,गौरव मिले  विख्यात हो ,वैभव मिले , शोहरत तुम्हारा दास हो।  प्रार्थना है ईश से मेरी। 

रौशनी -ए -चिराग

रौशनी -ए -महफ़िल ,तू उदास क्यूँ है ?  जिंदगी की दुश्वारियों से हताश क्यूँ है ? न जाने कितनी जिंदगियों का है तू नूर , फिर बेबस और लाचार क्यूँ है ? जिसकी बातें है ,तिलिस्म -ए -चिराग , फिर अभी तेरे दिल में अंधकार क्यूँ है ? चिराग को घिस और रौशनी जला , यही कर देगा ,तेरा रौशन जहाँ। 

सुकुन कहाँ -कहाँ न ढूँढा

सुकूँ पाने की चाहत में मई चुपचाप बैठी थी।  तभी मैं  बादलों की गड़गड़ाहट से अभिभूत हुई , शायद पानी अब बरसेगा ,पर वो नहीं बरसा।  ये देख मैं अकुलाई।  सुकूँ पाने की चाहत में ,मैं नदी किनारे चली आयी  पर वो थी की खुद पे इतराई। बस !अपने धुन में ही खोई।  फिर मैं अपने घर लौट आयी।  सुकून की तलाश ने मुझे सागर तट पे पहुँचाया।  पर वो अपनी लहरों में खोया था,अपनी ही गहराईयो में खुद को डुबोया था।  मैं चुपचाप लौट आयी   अपने यादों में खोयी सी।  जाने सुकूँ कहाँ है ?बस सोचकर रोई।  फिर मैं एक दिन यादो में खोयी थी ,की वहाँ देखा मैंने ' सुकून ' वहाँ पे सोई थी।  यादों की जंजीरो ने उसे था जोर से जकड़ा।  उसे आजाद कर दूँ तो शायद सुकून को पा सकूंगी मैं।  जिंदगी को फिर हँसी बना सकूँगी मैं। 

अनोखा सफर

  जिंदगी के गर्त में ,रास्ते थे अनगिनत  पर जिंदगी की धुंध में ,वो आये न मुझको नजर।  आँख डबडबाई थी ,कैसे करुँ गुजर -बसर ? साथ मेरे आस थी ,जो सदैव मेरे पास थी।  आयेंगी जो आँधियाँ ,मुझे उड़ा न पायेंगी।  मैं भी बड़ा अजीब थी ,धुंध में निकल पड़ी  बिना दिखे ही रास्ता !पर विश्वास मेरे साथ था।  गोद में था अंश मेरा ,अनजान था वो रास्ता।  जाने वो क्या चीज़ थी !जो दिखा रही थी रास्ता।  उस पथ में मैं बढ़ती गयी ,निडर रही ,डरी नहीं।  जो प्राण मेरे साथ है ,तो फिर कैसी निश्वासता। 

रंग -ए -दुआ

दौलत -ए -इल्म से हो राह रौशन आपकी , तरन्नुम -ए -जिंदगी में हो शोहरत आपकी , मिल जाये आपको फिरदौस -ए -जहाँ , हर तरफ आपके मौसम -ए -बहारा हो।  बस गुजारिश है कायनात से मेरी  आपकी रुवाहिशो को मक़ाम -ए -सुकूँ मिले।  उस मालिक को रहमत बरसे और आपके हौसलों को परवाज़ मिले।  रब की मेहर हो आप पर  पा जायें दो जहाँ की खुशियाँ।  जिंदगी में नूर -महल हो शामिल  मिल जाये आपको ख्वाबो की मल्लिका।  यही है मेरी हर्फ़ -ए -दुआ। 

दस्तूरे -ए -चिराग

दस्तूर -ए  -चिराग जलता रहा अंधकार मिटाने को।  आँधियाँ भी लगी रही उसी बुझाने को।  ब -दस्तूर दिया तम से लड़ता रहा , अपने अंजाम की परवाह किये बिना जलता रहा।  कभी मंदिर में जला ईश्वर का स्नेह  पाने को , कभी झोपडी में रौशनी फैलाने को।  घर में तो अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से जला।  उसकी तबियत ही थी जग का हो जाये भला।  सूरज के सामने उसकी हैसियत न थी कुछ भी , फिर भी प्रण ले अंधकार मिटाने में था लगा.