अनोखा सफर
जिंदगी के गर्त में ,रास्ते थे अनगिनत
पर जिंदगी की धुंध में ,वो आये न मुझको नजर।
आँख डबडबाई थी ,कैसे करुँ गुजर -बसर ?
साथ मेरे आस थी ,जो सदैव मेरे पास थी।
आयेंगी जो आँधियाँ ,मुझे उड़ा न पायेंगी।
मैं भी बड़ा अजीब थी ,धुंध में निकल पड़ी
बिना दिखे ही रास्ता !पर विश्वास मेरे साथ था।
गोद में था अंश मेरा ,अनजान था वो रास्ता।
जाने वो क्या चीज़ थी !जो दिखा रही थी रास्ता।
उस पथ में मैं बढ़ती गयी ,निडर रही ,डरी नहीं।
जो प्राण मेरे साथ है ,तो फिर कैसी निश्वासता।
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