दस्तूरे -ए -चिराग
दस्तूर -ए -चिराग जलता रहा अंधकार मिटाने को।
आँधियाँ भी लगी रही उसी बुझाने को।
ब -दस्तूर दिया तम से लड़ता रहा ,
अपने अंजाम की परवाह किये बिना जलता रहा।
कभी मंदिर में जला ईश्वर का स्नेह पाने को ,
कभी झोपडी में रौशनी फैलाने को।
घर में तो अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से जला।
उसकी तबियत ही थी जग का हो जाये भला।
सूरज के सामने उसकी हैसियत न थी कुछ भी ,
फिर भी प्रण ले अंधकार मिटाने में था लगा.
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