सुकुन कहाँ -कहाँ न ढूँढा
सुकूँ पाने की चाहत में मई चुपचाप बैठी थी।
तभी मैं बादलों की गड़गड़ाहट से अभिभूत हुई ,
शायद पानी अब बरसेगा ,पर वो नहीं बरसा।
ये देख मैं अकुलाई।
सुकूँ पाने की चाहत में ,मैं नदी किनारे चली आयी
पर वो थी की खुद पे इतराई। बस !अपने धुन में ही खोई।
फिर मैं अपने घर लौट आयी।
सुकून की तलाश ने मुझे सागर तट पे पहुँचाया।
पर वो अपनी लहरों में खोया था,अपनी ही गहराईयो में खुद को डुबोया था।
मैं चुपचाप लौट आयी
अपने यादों में खोयी सी।
जाने सुकूँ कहाँ है ?बस सोचकर रोई।
फिर मैं एक दिन यादो में खोयी थी ,की वहाँ देखा मैंने ' सुकून ' वहाँ पे सोई थी।
यादों की जंजीरो ने उसे था जोर से जकड़ा।
उसे आजाद कर दूँ तो शायद सुकून को पा सकूंगी मैं।
जिंदगी को फिर हँसी बना सकूँगी मैं।
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